श्रीकृष्ण भगवान गीता में कहते हैं, चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोअर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरथार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।। हे भरतश्रेष्ठ चार प्रकार के पुन्यात्मा मेरी सेवा करते हैं- आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी । इसका मतलब है कि चार प्रकार के लोग भगवान की शरण में आते हैं, पहला जो पीड़ित है, दूसरा जो जिज्ञासु हैं, तीसरा जो अर्थ चाहता है, औऱ चौथा है ज्ञानी। तेषां ज्ञानी नित्युक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। तिप्रो हि ज्ञानिनअत्यर्थमहं स च मम प्रिय:।। इनमें से जो परमज्ञानी है और शुद्धभक्ति में लगा रहता है, वह सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि मैं उसे अत्यंत प्रिय हूं और वो मुझे अत्यंत प्रिय हैं।…
भक्तियोग - भगवद्दीता में भगवान कृष्ण द्वारा दिया भक्ति योग के सिद्धांत जैसे मन को श्रीकृष्ण में स्थिर रखना , कृष्ण का चिंतन करना , कर्म का भगवान को समर्पण है।
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, परमात्मा समस्त इन्द्रियों के मूल स्त्रोत हैं, फिर भी वे इन्द्रियों से रहित हैं। वे समस्त जीवों के पालनकर्ता होकर भी अनासक्त हैं, वे प्रकृति के गुणों से परे हैं, फिर भी वे भौतिक प्रकृति के समस्त गुणों के स्वामी हैं। उनके हांथ, पांव, आंखें, सिर तथा मुह तथा उनके कान सर्वत्र हैं, इस प्रकार परमात्मा सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर अवस्थित हैं। परमात्मा समस्त प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं। वे भौतिक अंधकार से परे हैं और अगोचर हैं। वे ज्ञान हैं, ज्ञेय हैं, ओर ज्ञान के लक्ष्य हैं। वे सबके हृदय में स्थित हैं।…