श्रीकृष्ण भगवान गीता में कहते हैं, चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोअर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरथार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।। हे भरतश्रेष्ठ चार प्रकार के पुन्यात्मा मेरी सेवा करते हैं- आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी । इसका मतलब है कि चार प्रकार के लोग भगवान की शरण में आते हैं, पहला जो पीड़ित है, दूसरा जो जिज्ञासु हैं, तीसरा जो अर्थ चाहता है, औऱ चौथा है ज्ञानी। तेषां ज्ञानी नित्युक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। तिप्रो हि ज्ञानिनअत्यर्थमहं स च मम प्रिय:।। इनमें से जो परमज्ञानी है और शुद्धभक्ति में लगा रहता है, वह सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि मैं उसे अत्यंत प्रिय हूं और वो मुझे अत्यंत प्रिय हैं।…
भक्ति करने वाले लोग परेशान क्यों रहते हैं, ये प्रश्न अधिकतर वो लोग पूंछते हैं, जो भक्ति नहीं करते या जिनको ये लगता है, कि भक्त के जीवन में कष्ट क्यों होता है, इसके अलावा कुछ ऐसे लोग भी इस प्रश्न को पूंछते हैं, जो भक्ति की शुरूआत करते हैं। इसका उत्तर अगर आप अगर रामचरित मानस से समझते हैं, तो उसमें भगवान कहते हैं, सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ इसका अर्थ है, कि जैसे ही जीव भगवान के सन्मुख होता है, तो वो करोड़ो जन्म के पाप को नष्ट कर देते हैं। यानि भगवान…