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    भक्ति कितने प्रकार की होती है?

    आप में से बहुत सारे लोगों से भक्ति के बारे में सुना होगा कि भक्ति करो , भक्ति से भगवान मिलते हैं, लेकिन आपको हो सकता है, कि ये पता न हो कि भक्ति कैसै करें, भक्ति कितने प्रकार की होती है, हालांकि ये प्रश्न आस्तिक लोग पूंछते हैं जो भगवान की प्राप्ति चाहते हैं, और जीवन में आनंद चाहते हैं, क्योंकि भक्ति के बिना किसी का कल्याण नहीं हो सकता । आपमें से अधिकांश लोगों ने भक्त प्रहलाद के बारे में सुना होगा, भक्त प्रहलाद ने अपने पिता हिरणक्श्यपु को नवधा भक्ति के बारे में बताया था यानि भक्ति…

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    भक्तियोग- भगवद्गीता

    भक्तियोग - भगवद्दीता में भगवान कृष्ण द्वारा दिया भक्ति योग के सिद्धांत जैसे मन को श्रीकृष्ण में स्थिर रखना , कृष्ण का चिंतन करना , कर्म का भगवान को समर्पण है।

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    भगवान को कैसे महसूस करें

    एक बार एक भक्त से किसी ने पूंछा कि भगवान को नहीं देखा, भगवान को महसूस नहीं किया तो भक्ति क्यों करते हो ? तो भक्त ने बहुत ही सुंदर जवाब दिया, भगवान तुम्हे भले दिखाई न दे, लेकिन मेरे अनुभव में वो हमेशा ही मेरे साथ रहते हैं, तो व्यक्ति ने फिर पूंछा कि हमे अनुभव क्यों नहीं होता, तो भक्त ने कहा तुमने कभी भगवान का नाम जप नहीं किया, ध्यान नहीं किया, संतो की संगति नहीं की, शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया तो कैसे अनुभव होगा, तो व्यक्ति ने फिर पूंछा कि क्या बिना इसके अनुभव नहीं…

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    भगवद्गीता , प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

    श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, परमात्मा समस्त इन्द्रियों के मूल स्त्रोत हैं, फिर भी वे इन्द्रियों से रहित हैं। वे समस्त जीवों के पालनकर्ता होकर भी अनासक्त हैं, वे प्रकृति के गुणों से परे हैं, फिर भी वे भौतिक प्रकृति के समस्त गुणों के स्वामी हैं। उनके हांथ, पांव, आंखें, सिर तथा मुह तथा उनके कान सर्वत्र हैं, इस प्रकार परमात्मा सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर अवस्थित हैं। परमात्मा समस्त प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं। वे भौतिक अंधकार से परे हैं और अगोचर हैं। वे ज्ञान हैं, ज्ञेय हैं, ओर ज्ञान के लक्ष्य हैं। वे सबके हृदय में स्थित हैं।…

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    हनुमान जी के जीवन से सीख

    हनुमान जी जब सीता जी का पता ढूढ़कर आए,तो रामजी कहते हैं, हे हनुमान, तुम जैसा उपकारी देवता , मनुष्य कोई भी नहीं है, मैने तुम्हारे बारे में बहुत विचार किया लेकिन मैं किसी भी तरह तुम्हारे ऋण से मुक्त नहीं हो सकता , श्रीराम की ऐसी बातों को सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए,और श्रीराम जी के चरणो में गिर पड़े, श्रीराम ने उनको चरणों से उठाकर हृदय से लगाया और हांथ पकड़कर अपने पास  बैठा लिया और पूंछने लगे.कि रावन  की इतनी सुरक्षित सोने को लंका जहां पर राछसों का पहरा था, तुमने कैसे जलाया, ये सुनकर हमुमान…