श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं! जो लोग भक्ति में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे प्राप्त नहीं कर पाते। और वे इस भौतिक जगत में जन्म-मृत्यु के मार्ग में वापस आते रहते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं! यह सम्पूर्ण जगत मेरे अव्यक्त रूप द्वारा व्याप्त है। समस्त जीव मुझमें हैं, किंतु मैं उनमें नहीं हूं। मेरे द्वारा उत्पन्न सारी वस्तुएं मुझमें स्थित नहीं रहतीं। जरा, मेरे योग-ऐश्वर्य को देखो! यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालक हूं और सर्वत्र व्याप्त हूं, लेकिन मैं इस विराट अभिव्यक्ति का अंश नहीं हूं, क्योंकि मैं सृष्टि का कारणस्वरूप हूं। जिस प्रकार प्रवाहमान प्रबल वायु…
1- श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है और उसका नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है। जीवों के भौतिक शरीर से सम्बंधित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है। 2- श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, निरंतर परिवर्नशील यह भौतिक प्रकृति अधिभूत (भौतिक अभिव्यक्ति कहलाती है। भगवान का विराट रूप, जिसमें सूर्य तथा चंद्र जैसे समस्त देवता हैं, अधिदैव कहलाता है। तथा प्रत्येक देहधारी के हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित मैं परमेश्वर अधियज्ञ (यज्ञ का स्वामी ) कहलाता हूं। 3-हे कुंतीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव…
कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्दि के लिए प्रय़त्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से बिरला ही कोई एक मुझे वास्तव में जान पाता है।।
न तो कर्म से विमुख होकर कोई कर्मफल से छुटकारा पा सकता है, और न केवल सन्यास से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। यदि कोई निष्ठावान व्यक्ति अपने मन के द्वारा कर्मेंद्रियों को वश में करने का प्रयत्न करता है,और बिना किसा आसक्ति के कर्मयोग (कृष्णभावनामृत में) प्रारम्भ करता है, तो वह अति उत्कृष्ट है। श्रीविष्णु के लिए यज्ञ रूप में कर्म करना चाहिए,अन्यथा कर्म के द्वारा इस भौतिक जगत में बन्धन उत्पन्न होता है। अत׃ हे कुंतीपुत्र उनकी प्रसन्नता के लिए अपने नियत कर्म करो। इस तरह तुम बन्धन से सदा मुक्त रहोगे। स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के लिए न…
सुविचार, जीवन के सुविचार, जीवन के अनमोल विचार, प्रेरणादायक बातें, अनमोल बातें, सच्ची बातेंं, जीवन की सत्य बातें, मोटिवेशनल थाट्स